आजकल
फुर्सत कहाँ किसी को किसी के लिए यहाँ,मस्त हैं सब अपने-अपनों में ही आजकल। दौर आया कुछ ऐसा इस कलयुग
Read Moreभूख हर एक शाम तक पहुँची,पर न रोटी ही थाल तक पहुँची। सिंहासन चढ़ते रहे चेहरे सब,भूख क्यों नीलाम तक
Read Moreजिस घर में जन्मती हैं बेटियांउस घर में आती हैं समृद्धियां।गया समय, जब पुत्र जन्म परघर-घर में बजती थीं थालियां।अब
Read Moreआ धमके साले-बहनोई होली मेंबजट कर गया साफ़ रसोई होली में फागुन ने सबको मतवाला कर डालालगता नहीं पराया कोई
Read Moreआहट विरल वसंत की, रँगे हुए निज चीर।तन -मन वन -वन झूमती, सर सरिता के तीर।। अमराई में गूँजते, कुहू-कुहू
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