कविता- कैसे कहूं?
मन में मेरे कहने को है बहुत कुछ,कैसे कहूं? कुछ समझ न पाऊं,मन में रखूं तो मन रूठ जाता है,बाहर
Read Moreमन में मेरे कहने को है बहुत कुछ,कैसे कहूं? कुछ समझ न पाऊं,मन में रखूं तो मन रूठ जाता है,बाहर
Read Moreनौतपा की अग्नि ज्वाला, धरती को तपाने आई है,प्रखर हुईं सूरज की किरणें, अम्बर ने आग बरसाई है। नौतपा की
Read Moreपहले हर बात दिल पर लेती थी,छोटी-सी बात में क्रोधित-सी होती थी,लोगों के शब्दों के अर्थ ढूंढती थी,फिर भी संतुष्ट
Read Moreलाल दुपट्टा, मीठी मुस्कान,माँ जैसी लगती पूरी जहान।गोदी में नन्हा सपना प्यारा,आँखों में चमके चाँद सितारा। मेले की रंग-बिरंगी राहें,खुशियों
Read Moreजिसे देखो वो ही भाग रहा अपनों से जुदा हो रहा पर जा कहाँ रहा है उसको खुद पता नहीं
Read Moreये चिलचिलाती भीषण गर्मी और प्यास तन-मन,अधीर थका मांदा रूखा-सुखा सा हुआ है जीवन,नौ तपा ने भी दिखाया अब ज्वलंत
Read Moreआखिर बेटियों को मौत क्यों?क्यों हर दिन किसी दिशा शर्मा की चिता जलती है?क्यों किसी माँ की गोद सूनी होती
Read Moreजब सूर्यरोहिणी नक्षत्र के प्रखर द्वार परअपने अग्नि-चरण रखता है,धरती की देह परताप का एक अदृश्य शास्त्र लिखना आरम्भ हो
Read Moreबेटियों के जल्लादों का हिसाब कब होगा,ये सोई हुई व्यवस्था का जवाब कब होगा।हर रोज़ कहीं मासूमियत कुचली जाती है,इंसाफ़
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