मुक्तक/दोहा

आँगन की मुस्कान

नन्हे-नन्हे पाँव हैं, सपनों की उड़ान।बचपन की किलकारियाँ, घर की हैं पहचान॥ साइकिल, गुड़िया, खिलौने, मन में भरे उमंग।हँसते-गाते बालपन,

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राजनीति

हर शहर में सुलगती लापरवाही: क्या अगला लखनऊ आपका होगा?

जब कागजों की मंजूरियाँ और बंद लिफाफे सच को ढकने लगते हैं, तब आग केवल इमारतों तक सीमित नहीं रहती,

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कविता

अतीत की यादें

पुरानी राहें,धूप में सोई हुई,मन टटोलता। सूखे पत्तों में,बीते वर्षों की गूँज,धीरे बहती। खिड़की के पास,चाँदनी चुपके उतरे,स्मृतियाँ जागें। बरगद

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