लघुकथा: “चार बजे की माँ”
सुबह के चार बजे थे। बाहर अभी भी अंधेरा पसरा था, मगर प्रियंका की नींद खुल चुकी थी। अलार्म बजने
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Read Moreवृंदावन की संकरी गलियों में धूप आग उगल रही थी। मंदिर के सामने, आठ साल की गुड़िया माथे पर पसीना
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