कविता
जिंदगी की सारी मौज खत्म हुईअब जिंदगी शुरू हुईरास्ते का न कोई हमसफर, न कोई मंजिलएक राही की तरह अब
Read Moreनारी संस्कार बीज बोएगी, जब स्वयंसिद्धा हो जाएगी, मर्यादा की लक्ष्मण रेखा, आप ही खिंच जाएगी।। मर्यादा में रहें जब
Read Moreमैं हूँ स्त्री, मैं ही पुरुष, अर्द्धनारीश्वर की हूँ कृति,फिर क्यों जग के इस आँगन में, होती हमारी दुर्गति? हाँ
Read Moreबारिश की बूंदों को जलाना आ गयाक्या कहें उनको भी हराना आ गयातीखे शब्द मेरे, पन्ने झेल नहीं पाए औरजेठ
Read Moreआप सभी को बधाइयाँ शुभकामनाएँ हैं क्योंकि आज गंगा दशहरा है इस दिवस की भी औपचारिकता निभाइए।और कुछ तो आप कर नहीं
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