कुदरती रचना से परे क्यूँ नहीं देखते ?
रूप कितने … इक औरत के।हर आदमी क्यूँ ? फिर इक नज़र से देखता ।। देहरूपी रचना… से परे।क्यूँ? ओर
Read Moreरूप कितने … इक औरत के।हर आदमी क्यूँ ? फिर इक नज़र से देखता ।। देहरूपी रचना… से परे।क्यूँ? ओर
Read Moreहुआ ग्रीष्म ऋतु का आगमन बढ़ रहा रवि का ताप,देखो बदले-बदले से हैं मौसम के मिजाजी आलाप,तेज ठंडी हवाओं ने
Read Moreमाँ की गोद में सोया था एक ‘नन्हा-सा’ सपना,सीने से लगाए उसे थामे थी देख रहीं तड़पना।आँखों में था डर,
Read Moreआज सालों बाद खुला सँदूकतो उसमें मिली कुछ चिठ्ठियाँ ,चिठ्ठियों के दिन पुरे हो चुके थेपीले पड़ गए पुराने पृष्ठजगह-
Read Moreऐसे-ऐसे बोलते हैं हमें-हमलोगों को रोज-रोज़चमार तो कभी चमरोटाकह कर बुलाते हैं। ऐसे-ऐसे बोलते हैं हमें-नाली के कीड़े जैसीजात है
Read Moreजब से मैंने होश संभाला,मां-बाप ने विद्यालय में डाला,गुरुजनों और साथियों ने साथ निभाया,शब्दों को कैसे गढ़ना है—यह हुनर सिखाया।
Read Moreशहर छोड़ लौट चलूं अब वापिस अपने गांव गांव छोड़ शहर आया था कुछ पाने और कमाने किया हिसाब तो
Read Moreशून्य से शिखर तक का, जिसने पथ बनाया है,कड़कती धूप में जिसने, खुद को ही जलाया है।वह मात्र एक देह
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