मूक दर्शक
अक्सर महसूस करती हूँआत्मा दूर खड़ीगतिमान है,तन्हा शरीरसंवेदनाहीनज़िंदगी के रास्तों पर गतिमान है। जैसे कठपुतली के धागेछूट गए हों हाथों
Read Moreकुछ नालायक बेटों नेबाप को विवश कर रखा हैकमाने के लिएजो बुजुर्ग हो चुके हैंकोई मजदूरी कर रहा हैकोई ई-रिक्शा
Read Moreकैसे कह दूँ ?कोई अशिक्षित नहीं रहेगा ।कोई दारू,सिगरेट नहीं पिएगा ।नहीं पिटेगी घर में कोई महिला ।सड़कों पर कोई
Read Moreप्रयागराज की सड़कों परअस्मिता को बचाने के लिएएक स्वाभिमानी महिलामजबूत इरादों से परिपूर्णभरी युवावस्था मेंवह विधवा हो गयी हैसमाज से
Read Moreठंडे-ठंडे पानी में मुझेये क्या हो गया हैजैसे झील में कोईकमल खिल गया है। प्रीत में जैसे कोईमन-मीत मिल गया
Read Moreओ सिस्टम के बेईमानों,तुम कब तक आंख चुराओगे?संविधान की पावन प्रति को,कब तक धूल चटाओगे?हक़ खा रहे, लहू पी रहे,ओ
Read Moreमाँ को कुर्सी दे दो, इतना तो “सम्मान” रहे,उम्र की ढलती शाम, चेहरे पर मुस्कान रहे।राजनीति अपने स्थान, मतभेदों में
Read Moreदलित, पिछड़े और सवर्णहम सबको पास बुलाते हैं,हैं सभी नागरिक इस देश के,सबको गले लगाते हैं,इंसानियत ही धर्म है अपना,पीड़ा
Read Moreकिसको अपनी पीर कहें, हम सवर्ण हैं,दया दान धर्म पालन रीति, हम सवर्ण हैं।मेहनत कर आगे बढ़ते, नही ईर्ष्या भाव,फिर
Read Moreमधुर स्वरों से वाणी सजी हुई, वीणा के ज्यों बजते हो तारधुन मुरली सी कान्हा की, हर बात में छलक
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