वो ठूँठ
रास्तों के दोनों ओरउग आए हैं वृक्ष हज़ारों।अंबर छूने की आकांक्षा में,वितान बन छा जाते हर बार। हरी-भरी शाखों पर
Read Moreखामोश थीं दीवारें, पर ‘दर्द’ चीख रहा था,ये इंसान ही इंसान को नीचे गिरा रहा था। क्यों? स्त्री जननांग से
Read More“आनंद” अपनत्व से भरपूर प्यारा सा परिवार,मिलें जहॉं बुजुर्गों का सानिध्य छोटों का चटकार,जीवन किताब के हर कोरे पन्ने को
Read Moreलोग भूल जाते हैं एहसान,जब खड़ा हो जाता है मकान। जिनके दर पे झुके थे हम कभी,आज वही लगते हैं
Read Moreवे बहुत भूखे हैपर खाने के नहीतुम्हारे हिस्से खाने के।वो प्यासे भी हैपर नीर के नहीतुम्हारे देह में बहती रक्त
Read Moreशब्द इस्तेमाल किये जाये यह जरुरी नहीं भाव भंगिमायें ही व्यक्त कर देती है आदमी के मन में छुपी बात
Read Moreस्वर की वो रानी, सुरों की मूरत,हर दिल में बसती, मधुर सी सूरत।गीतों की गंगा, सुरों का सागर,तेरी आवाज़ में
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