जीवन
ज़माने से तो बहुत बात हो गई जान भी लिया उसको क्षणिक रुकते हैं खुद से भी अब बात करते
Read Moreतेरे दर्द को अल्फ़ाज़ दूंगामत सोच तू अकेला हैंहर कदम पर तेरा साथ दूंगा। दर्द का समुंदर जो तेरे अंदरनित्य
Read Moreराहें थीं सीधीअचानक मुड़ गईंपवन के संग धूप के सायेचलते रहे कदमदिशा बदली सूखी सी मिट्टीअंकुर फिर भी फूटेआशा जगी
Read Moreहे धन्य श्रमिक! तुम स्वेद – स्नेह दे,जीवन – दीप जलाते हो।धरती माँ के सच्चे सपूत,श्रम का शुभ चक्र चलाते
Read Moreखामोश थीं दीवारें, पर ‘दर्द’ चीख रहा था,ये इंसान ही इंसान को नीचे गिरा रहा था। क्यों? स्त्री जननांग से
Read More“आनंद” अपनत्व से भरपूर प्यारा सा परिवार,मिलें जहॉं बुजुर्गों का सानिध्य छोटों का चटकार,जीवन किताब के हर कोरे पन्ने को
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