तकिया चल पड़ा
शिरोधान गतिशील हुआ आजढूँढने श्रमजीवी के मस्तक-ताज।जिसने दिनभर पाषाण विदीर्ण कियाअसंख्य बोझ निज कंधों पर लिया।चतुष्पथ पर जो नित रहा
Read Moreशिरोधान गतिशील हुआ आजढूँढने श्रमजीवी के मस्तक-ताज।जिसने दिनभर पाषाण विदीर्ण कियाअसंख्य बोझ निज कंधों पर लिया।चतुष्पथ पर जो नित रहा
Read Moreयेलाभहानि काचक्कर भीउलझा देताहम मानवों कोकैसी विडंबना है। येसोच हमारी आभासी हैतो क्या हो गयालाभ-हानि तो होगा सोच पर निर्भर। देरहासबको अवसरलाभ उठाओया गर्त
Read Moreकल तक मौन थी, आज महक रही है।फूल ने समझाया जीवन में सबसेसुंदर परिवर्तन शोर से नहीं,धीरे-धीरे और चुपचाप होते
Read Moreगैस, पेट्रोल, डीज़ल के दाम,हर दिन लिखते नए पैगाम।जेब हो रहीं और भी हल्की,जीवन में छा रहीं हैं कड़की। पहियों
Read Moreमिट्टी सब याद रखती है, हर कदम का हिसाब रखती है,पसीने की हर बूंद को, अपने आँचल में सहेजती है,खामोशी
Read Moreजी रहा हूँ जीवनबड़ी ही शिद्दत सेक्या मेरी पीड़ा काकारण बन तुममुझे शून्य करोगे ? हारा तो कभीथा ही नहीं
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