ग़ज़ल
खूब दिखते भले भले बाहरहै कुदूरत भरी मगर भीतर हौसला है नहीं अगर अन्दरक्या लड़ेंगे हमीद से कायर खूबसूरत पहाड़
Read Moreअनजान ‘शहर’ की गलियों में,मैं खुद को ढूँढता फिर रहा हूँ।हरेक चेहरा लगता अपना-सा,फिर भी ‘तन्हा-तन्हा’ रहता हूँ। यहाँ पर
Read Moreक्यों मन मलिन उदास सखे,याद किसी की आई है?बैठे हो सरि के कूल परदखे किसकी परछाई है? क्यों चौंक मुड़े
Read Moreशिरोधान गतिशील हुआ आजढूँढने श्रमजीवी के मस्तक-ताज।जिसने दिनभर पाषाण विदीर्ण कियाअसंख्य बोझ निज कंधों पर लिया।चतुष्पथ पर जो नित रहा
Read Moreयेलाभहानि काचक्कर भीउलझा देताहम मानवों कोकैसी विडंबना है। येसोच हमारी आभासी हैतो क्या हो गयालाभ-हानि तो होगा सोच पर निर्भर। देरहासबको अवसरलाभ उठाओया गर्त
Read Moreआदत आप सुधारिए, मानो मेरी बात।क्यों तुमको अच्छा लगे, खाते रहना लात।।खाते रहना लात, कसम खाए हो बैठे।जानें कैसा दंभ,
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