पद्य साहित्य

कविता

तकिया चल पड़ा

शिरोधान गतिशील हुआ आजढूँढने श्रमजीवी के मस्तक-ताज।जिसने दिनभर पाषाण विदीर्ण कियाअसंख्य बोझ निज कंधों पर लिया।चतुष्पथ पर जो नित रहा

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कविता

आभासी मंचों से लाभ-हानि

येलाभहानि काचक्कर भीउलझा देताहम मानवों कोकैसी विडंबना है। येसोच हमारी आभासी हैतो क्या हो गयालाभ-हानि तो होगा सोच पर निर्भर। देरहासबको अवसरलाभ उठाओया गर्त

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