सच भूल गए
सत्ता के मद में सच भूल गए सोच रहे हैंभारत की पूरी जनता तो हमारी गुलाम है दुर्दशा है लोकतंत्र
Read Moreदावा नहीं करती दवा,रोग मिटाने का कभी,दुआ काम करती है वहाँ,बस दो मीठे बोल लिए। पता चल जाता है,कौन अपना,
Read Moreवह सुबह की पहली किरण हैजो अंधेरों को सहलाकर जगाती हैवह शाम की थकी हुई लालिमा हैजो दिनभर के सफ़र
Read Moreबाहर ही मिलता है सब कुछयह नासमझी की हैं बातेंअमेरिका और कनाडा की रातों सेहैं सुंदर मेरे भारत की रातें
Read Moreसत्ता के शिखरों पर जो दीपक जलते थे,आज वही धुएँ में अपने निशान ढूँढ़ते हैं।भीड़ की तालियों से “गूँजते” थे
Read Moreभीड़ में मैं हूँ खड़ा, फिर भी अकेलापन सालता है। चेहरे हज़ारों पास मेरे, आँख से आँख फिर भी अजनबी,
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