जून तुम आए हो
व्याकुल मन को बॅंधाते धैर्य सावन की फरियाद लिए,जून तुम आए हो आशाओं का नव “आनंद” राग लिए । बीतेगी
Read Moreव्याकुल मन को बॅंधाते धैर्य सावन की फरियाद लिए,जून तुम आए हो आशाओं का नव “आनंद” राग लिए । बीतेगी
Read More‘सत्ता’ बदली, बदले चेहरे, बदले शासन के व्यवहार,सवाल वही फिर उठा, किसका घर-क्या?अधिकार। कहतीं राबड़ी दृढ़ स्वर में, “नहीं छोड़ेंगे
Read Moreमत भूल, नारी केवल घर की नहीं,समाज और सभ्यता के सम्मान की पहचान होती है,संस्कारों की धड़कन, परिवार की मुस्कान
Read Moreकवि कुछ ऐसा गान लिखोकिअंतर्मन की चेतना जागृत हो,गूंज से दिगंत गुंजित हों,अन्तस् परिवर्तित हो,जीवन मोहक हो, रसवंत हो,अंतर्द्वंद्व-अंतर्कशाय विलुप्त
Read Moreउन रंगीन महफ़िलों की नुमाइश! बनके रह गई औरत ।मिलती आज, हर गली- नुक्कड़ चौराहे पे तबायफ ।। मैं! पूछती
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