कागज़
कागज़कभी लगता है घना जंगल,किंतु क़लम लेते हीबन जाता हैदहकता रेगिस्तान,कभी लगता है असीम समंदर,तो कभी बन जाता है बवंडर,कभी
Read More‘सत्ता’ बदली, बदले चेहरे, बदले शासन के व्यवहार,सवाल वही फिर उठा, किसका घर-क्या?अधिकार। कहतीं राबड़ी दृढ़ स्वर में, “नहीं छोड़ेंगे
Read Moreमत भूल, नारी केवल घर की नहीं,समाज और सभ्यता के सम्मान की पहचान होती है,संस्कारों की धड़कन, परिवार की मुस्कान
Read Moreकवि कुछ ऐसा गान लिखोकिअंतर्मन की चेतना जागृत हो,गूंज से दिगंत गुंजित हों,अन्तस् परिवर्तित हो,जीवन मोहक हो, रसवंत हो,अंतर्द्वंद्व-अंतर्कशाय विलुप्त
Read Moreउन रंगीन महफ़िलों की नुमाइश! बनके रह गई औरत ।मिलती आज, हर गली- नुक्कड़ चौराहे पे तबायफ ।। मैं! पूछती
Read Moreश्रम साधक का बहे पसीना।चाहे सुख से वो भी जीना।।करना चाहे सपने पूरे।जो भी अब तक रहे अधूरे।। श्रम साधक
Read Moreनारी संस्कार बीज बोएगी, जब स्वयंसिद्धा हो जाएगी, मर्यादा की लक्ष्मण रेखा, आप ही खिंच जाएगी।। मर्यादा में रहें जब
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